
आयुर्वेद में स्रोतसों को केवल निर्जीव नलिकाएं नहीं माना गया है, बल्कि ये जीवित संवहन मार्ग हैं जो स्वयं धातुओं से बने होते हैं और संबंधित धातु के रंग व आकार के समान होते हैं (“सस्थान वर्ण सदृशाः”)। स्रोतसों का मुख्य कार्य आहार रस से धातुओं तक पोषण पहुँचाना और मलों को बाहर निकालना है।
मॉडर्न साइंस दृष्टिकोण (Modern Science View)
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में स्रोतस की तुलना माइक्रो-सर्कुलेटरी चैनल्स (Micro-circulatory Channels), सर्कुलेटरी सिस्टम, लिम्फैटिक सिस्टम (Lymphatic System), और विभिन्न ट्रैक्ट्स (Tracts) से की जाती है:
मैक्रो स्रोतस (Macro-channels): जैसे आहारनाल (Gastrointestinal Tract), रक्त वाहिकाएं (Blood Vessels), और श्वसन मार्ग (Respiratory Tract)।
माइक्रो स्रोतस (Micro-channels): जैसे केशिकाएं (Capillaries), कोशिका झिल्ली के आयन चैनल्स (Cell Membrane Ion Channels), और लिम्फैडिनो-वेस्कुलर नेटवर्क।
आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि यदि कोशिकाओं के स्तर पर न्यूट्रिएंट एक्सचेंज (Nutrient Exchange) रुक जाए, तो सेल्यूलर डेथ (Cell Death) और क्रोनिक बीमारियाँ जन्म लेती हैं।
३. शास्त्रीय श्लोक संदर्भ (Classical References)
महर्षि चरक ने चरक संहिता (विमानस्थानम्, अध्याय ५ – स्रोतसामान विमानम्) में स्रोतसों की महत्ता का स्पष्ट वर्णन किया है:
“यावन्तो पुरुषे मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्त एवास्मिन् स्रोतसां प्रकारविशेषाः।” – (चरक संहिता, विमानस्थानम्, अध्याय ५, श्लोक ३)
श्लोक भावार्थ: मानव शरीर में जितने भी मूर्त (देखने योग्य या अमूर्त) भाव विशेष (अवयव व धातुएं) हैं, उतने ही प्रकार के स्रोतस शरीर में विद्यमान हैं। अर्थात शरीर का कोई भी भाग स्रोतस के बिना निर्मित नहीं हो सकता।
“न हि स्रोतोभ्यो अन्यो देहधातुर्वहति वा।” – (चरक संहिता, विमानस्थानम्, अध्याय ५)
श्लोक भावार्थ: स्रोतसों के बिना शरीर की धातुओं का संवहन, पोषण या परिवर्तन होना असंभव है।
४. १३ प्रधान स्रोतस और उनके कार्य (13 Main Srotas & Functions)
महर्षि चरक के अनुसार १३ मुख्य आंतरिक स्रोतसों को तीन व्यापक श्रेणियों में बांटा गया है:
श्रेणी A: जीवन और पोषण बनाए रखने वाले ३ स्रोतस
प्राणवह स्रोतस (Respiratory Tract):
मूल स्थान: हृदय और महास्रोतस (आहारनाल)।
कार्य: ऑक्सीजन (प्राणवायु) को ग्रहण करना और श्वसन तंत्र को सुचारू रखना।
अन्नवह स्रोतस (Digestive Tract):
मूल स्थान: आमाशय (Stomach) और वाम पार्श्व (Left Flank)।
कार्य: भोजन को ग्रहण करना, पचाना और आहार रस बनाना।
उदकवह स्रोतस (Fluid & Water Balance Tract):
मूल स्थान: तालु (Palate) और क्लोम (Pancreas/Pharynx)।
कार्य: शरीर में जल तत्व और तरल पदार्थों (Fluid Balance) का नियमन करना।
श्रेणी B: ७ धातुओं को पोषित करने वाले ७ स्रोतस
रसवह स्रोतस (Plasma & Lymphatic System): हृदय और १० मूल धमनियां। प्लाज्मा व न्यूट्रिएंट्स का संवहन।
रक्तवह स्रोतस (Circulatory System/Liver & Spleen): यकृत (Liver) और प्लीहा (Spleen)। आरबीसी व हीमोग्लोबिन का संवहन।
मांसवह स्रोतस (Muscular System): स्नायु (Tendons) और त्वचा। मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करना।
मेदोवह स्रोतस (Adipose System): वृक्क (Kidneys) और वपावहन (Omentum/Fat Deposits)। वसा और स्नेहन का नियमन।
अस्थिवह स्रोतस (Skeletomuscular System): मेद और जघन (Pelvis)। हड्डियों और कार्टिलेज को पोषण देना।
मज्जावह स्रोतस (Nervous System & Bone Marrow): अस्थियां और संधियां (Joints)। नसों व मज्जा का संचालन।
शुक्रवह स्रोतस (Reproductive System): वृषण (Testes) और स्तन/गर्भाशय। जनन क्षमता और ओज का निर्माण।
श्रेणी C: अपशिष्ट बाहर निकालने वाले ३ स्रोतस (Excretory Tracts)
पुरीषवह स्रोतस (Excretory/Excretory Gut): पक्वाशय (Large Intestine) और गुदा। मल (Feces) का विसर्जन।
मूत्रवह स्रोतस (Urinary System): बस्ति (Bladder) और वृक्क (Kidneys)। मूत्र (Urine) का निष्कासन।
स्वेदवह स्रोतस (Sweat & Integumentary System): मेद और लोमकूप (Skin Pores)। पसीने के माध्यम से टॉक्सिन्स बाहर निकालना।
(नोट: स्त्रियों में २ अतिरिक्त स्रोतस होते हैं — आर्तववह स्रोतस (Menstrual Tract) और स्तन्यवह स्रोतस (Lactation Tract)।)
५. स्रोतस दृष्टि (विकृति) के ४ मुख्य लक्षण (Types of Srotodushti)
जब स्रोतस दूषित या बाधित होते हैं, तो महर्षि चरक के अनुसार ४ प्रकार की विकृतियां (Srotodushti) उत्पन्न होती हैं:
अतिप्रवृत्ति (Hyper-secretion/Hyper-activity): शरीर के द्रवों का अत्यधिक बहना (जैसे- डायरिया में अत्यधिक दस्त या डायबिटीज में बार-बार पेशाब आना)।
संग (Blockage/Stasis): मार्ग में रुकावट आ जाना (जैसे- कब्ज, एथेरोस्क्लेरोसिस में धमनियों का ब्लॉक होना या अस्थमा में सांस की नाली में रुकावट)।
सिराग्रंथि (Nodules/Tumors/Varicose Veins): नसों में गांठें बनना या सूजन आ जाना (जैसे- वैरिकोज वेन्स, ट्यूमर या गलगंड)।
विमार्गगमन (Deviation/Wrong Direction): द्रवों का सही मार्ग छोड़कर उल्टे या गलत मार्ग में बहना (जैसे- वोमिटिंग/उल्टी होना, बीपी में रक्त का ऊपर की ओर चढ़ना या जलोदर/Ascites)।
६. स्रोतसों को स्वच्छ रखने के सिद्ध आयुर्वेदिक उपाय (Cleansing Remedies)
स्रोतसों के शोधन (Detoxification) के लिए निम्नलिखित आयुर्वेदिक उपाय अत्यंत प्रभावी हैं:
१. दीपन-पाचन आहार: सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली (त्रिकटु चूर्ण) का सेवन स्रोतसों के मुंह पर जमा ‘आम’ (Toxins) को पिघलाकर दूर करता है।
२. अभ्यंग और स्वेदन (Oil Massage & Steam Therapy): तिल के तेल की मालिश के बाद भाप (Steam) लेने से रोमकूप और सूक्ष्म स्वेदवह स्रोतस खुल जाते हैं।
३. गिलोय और गुनगुना पानी: नित्य गुनगुना पानी पीना और गिलोय क्वाथ लेना सभी १३ स्रोतसों का प्राकृतिक शोधक (Clensers) है।
४. पंचकर्म (Panchakarma): वमन (प्राणवह/अन्नवह का शोधन), विरेचन (रक्तवह/पित्त का शोधन), और बस्ती (पुरीषवह/वात का शोधन) स्रोतस शुद्धि की सबसे प्रामाणिक विधि है।
५. प्राणायाम (Nadi Shodhana): अनुलोम-विलोम प्राणायाम से प्राणवह और मज्जावह स्रोतस में रुकावट दूर होकर ऑक्सीजन का प्रवाह सुधरता है।
७. स्रोतस से जुड़ी अन्य आयुर्वेदिक अवधारणाएँ (Related Aspects)
स्रोतोरोध (Channel Blockage): जब मंदाग्नि के कारण अधपचा रस (‘आम’) बनता है, तो वह स्रोतसों में जाकर चिपक जाता है। इसे स्रोतोरोध कहते हैं, जो ९०% रोगों की जड़ है।
मर्म और स्रोतस: शरीर के मुख्य १०६ मर्म बिंदु किसी न किसी स्रोतस के मूल स्थान से सीधे जुड़े होते हैं।
धातु-पोषक न्याय: स्रोतसों के माध्यम से ही ‘केदारी-कुल्या न्याय’ के अनुसार धातुओं को क्रमिक पोषण प्राप्त होता है।
८. स्रोत एवं संदर्भ (Sources & Classical References)
यह लेख आयुर्वेद के निम्नलिखित प्रामाणिक ग्रन्थों पर आधारित है:
चरक संहिता (विमानस्थानम्, अध्याय ५ – स्रोतसामान विमानम्): १३ स्रोतसों, उनके मूल स्थानों, दृष्टि लक्षणों और उपचार का संपूर्ण विवेचन।
सुश्रुत संहिता (शारीरस्थानम्, अध्याय ९ – धमनी व्याकरण अध्याय): ११ युग्म स्रोतसों का शल्य-दृष्टिकोण।
अष्टांग हृदयम् (शारीरस्थानम्, अध्याय ३): स्रोतस उत्पत्ति और धातुओं से संबंध।
भावप्रकाश निघंटु: स्रोतस-शोधक द्रव्यों (जैसे- लहसुन, त्रिकटु, पुनर्नवा) का वर्णन।
९. स्रोतस से जुड़े ५ दुर्लभ सत्य (Rare & True Facts)
१. ‘क्लोम’ (Klama) का रहस्यमयी स्रोतस मूल:
उदकवह स्रोतस का मूल ‘क्लोम’ माना गया है। आधुनिक शोधकर्ता क्लोम की तुलना अग्न्याशय (Pancreas) और गले के थर्स्ट सेंटर (Thirst Centre in Brain) से करते हैं, जो शरीर में पानी के संतुलन को नियंत्रित करता है।
२. कोरोना वायरस और ‘प्राणवह स्रोतस’:
आधुनिक रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस (Respiratory Distress) वास्तव में आयुर्वेद के ‘प्राणवह स्रोतस दृष्टि’ का सटीक उदाहरण है, जहाँ कफ और सूज के कारण ऑक्सीजन संवहन रुक जाता है।
३. मनोवह स्रोतस (Mind Channels):
चरक संहिता में १३ भौतिक स्रोतसों के अलावा ‘मनोवह स्रोतस’ (Mind Channels) का भी वर्णन है। जब चिंता या अवसाद होता है, तो मनोवह स्रोतस में रुकावट आने से नींद और सोचने की क्षमता प्रभावित होती है।
४. जीभ पर वाइट कोटिंग (White Tongue) और स्रोतोरोध:
सुबह उठकर जीभ पर सफेद परत का जमना इस बात का प्रत्यक्ष संकेत है कि आपके अन्नवह और रसवह स्रोतसों में ‘आम’ (Toxins) जमा हो गया है और स्रोतस अवरुद्ध हैं।
५. कैंसर और ‘विमार्गगमन’:
कैंसर मेटास्टेसिस (Metastasis) — जहाँ कैंसर कोशिकाएं एक अंग से दूसरे अंग में फैलती हैं — आयुर्वेद के अनुसार ‘विमार्गगमन’ और ‘रस-रक्तवह स्रोतस दृष्टि’ का अंतिम रूप है।
१०. निष्कर्ष (Conclusion)
‘स्रोतस’ केवल शरीर रचना (Anatomy) का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि यह जीवन के निर्बाध प्रवाह की मूल कुंजी हैं। जब तक आपके शरीर के ये १३ संवहन मार्ग खुले और स्वच्छ रहेंगे, तब तक त्रिदोष, धातुएं और मल अपने प्राकृतिक संतुलन में रहकर आपको आरोग्य प्रदान करेंगे।
यदि आप निरंतर थकान, कब्ज, त्वचा रोगों या पाचन संबंधी विकारों से जूझ रहे हैं, तो केवल लक्षणों को दबाने के बजाय अपने स्रोतसों के शोधन (Detoxification) पर ध्यान दें। सुपाच्य आहार, प्राणायाम, गुनगुने पानी का सेवन और आयुर्वेदिक दीपन-पाचन द्रव्यों को अपनाकर अपने स्रोतसों को स्वस्थ रखें और दीर्घायु प्राप्त करें।
Author bio
Mukesh Kumar
योग्यता: D. Pharm. (Ayurvedic Pharmacy)
भूमिका: Ayurveda & Natural Wellness Content Researcher
समीक्षा/अपडेट: 3 September 2026
स्रोत: आयुर्वेदिक ग्रंथ, सरकारी स्वास्थ्य स्रोत एवं उपलब्ध विश्वसनीय वैज्ञानिक शोध

