
आयुर्वेद में “रोग” या “व्याधि” का अर्थ केवल किसी एक अंग में दिखाई देने वाले लक्षण से नहीं है। रोग को शरीर, मन, दोष, धातु, अग्नि, मल, स्रोतस तथा व्यक्ति की प्रकृति के बीच उत्पन्न असंतुलन की व्यापक स्थिति के रूप में समझा जाता है। चरक संहिता के अनुसार रोगों की संख्या वास्तव में अनगिनत है; अलग-अलग कारणों, स्थानों, लक्षणों और दोषों के संयोजन से रोगों के अनेक रूप बन सकते हैं। इसलिए प्रसिद्ध 140 रोगों की सूची को आयुर्वेद में “सभी रोगों की अंतिम सूची” समझना सही नहीं होगा। यह मुख्यतः वात, पित्त और कफ से उत्पन्न 80, 40 और 20 विशिष्ट नानात्मज विकारों का पारंपरिक वर्गीकरण है।
1. आयुर्वेद में रोग या व्याधि क्या है?
आयुर्वेद में स्वास्थ्य को शरीर और मन के संतुलन से जोड़ा गया है। जब शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली में ऐसा परिवर्तन आता है जिससे अस्वास्थ्य, पीड़ा या कार्यक्षमता में कमी उत्पन्न होती है, उसे विकार या रोग कहा जाता है।
चरक संहिता के महारोगाध्याय में रोगों को व्यापक रूप से आगन्तु और निज के रूप में समझाया गया है। आगन्तु रोग बाहरी कारणों से आरंभ हो सकते हैं, जबकि निज रोग दोषों के असंतुलन से उत्पन्न माने जाते हैं। साथ ही रोगों का अधिष्ठान मन और शरीर दोनों हो सकते हैं।
आयुर्वेद का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि एक ही लक्षण का कारण हर व्यक्ति में समान नहीं माना जाता। उदाहरण के लिए सिरदर्द किसी व्यक्ति में वातप्रधान कारण से, दूसरे में पित्तप्रधान कारण से और किसी तीसरे में अन्य कारणों से संबंधित हो सकता है।
इसीलिए आयुर्वेद में केवल “क्या लक्षण है?” नहीं, बल्कि “क्यों हुआ, कैसे विकसित हुआ और किससे बढ़ता या घटता है?” भी देखा जाता है।
2. आयुर्वेद में रोगों का प्रमुख वर्गीकरण
चरक संहिता के सूत्रस्थान, महारोगाध्याय 20 में रोगों का एक महत्वपूर्ण वर्गीकरण मिलता है:
चार प्रमुख समूह
आगन्तु रोग — बाहरी कारणों से संबंधित
वातज रोग — वात दोष की विकृति से संबंधित
पित्तज रोग — पित्त दोष की विकृति से संबंधित
कफज रोग — कफ/श्लेष्म दोष की विकृति से संबंधित
आयुर्वेदिक ग्रंथ यह भी बताते हैं कि निज रोगों में दो या अधिक दोष मिलकर भी विकार उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए 140 की सूची केवल एक-दोष-प्रधान (नानात्मज) विकारों की सूची है।
चरक संहिता 20/10 में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
“अशीतिर्वातविकाराः चत्वारिंशत् पित्तविकाराः।विंशतिः श्लेष्मविकाराः॥”
अर्थ: वात के 80, पित्त के 40 और श्लेष्म/कफ के 20 प्रमुख विकार बताए गए हैं—अर्थात पारंपरिक रूप से 80 + 40 + 20 = 140।
3. वात के 80 प्रमुख रोग — Sanskrit, Hindi और English
आयुर्वेद में वात दोष से संबंधित 80 प्रमुख नानात्मज विकारों का वर्णन मिलता है। नीचे इन रोगों को शरीर के प्रभावित क्षेत्र और प्रमुख लक्षणों के आधार पर चार आसान समूहों में व्यवस्थित किया गया है। English नाम केवल समझने की सुविधा के लिए दिए गए हैं और इन्हें आधुनिक चिकित्सा के निश्चित निदान के रूप में नहीं समझना चाहिए।
01–20 — निचले शरीर एवं मांसपेशी-हड्डी संबंधी विकार
1. नखभेद
संस्कृत: नखभेद
हिंदी: नाखूनों का फटनाEnglish: Cracking of Nails
2. विपादिका
संस्कृत: विपादिका
हिंदी: पैरों या एड़ियों का फटनाEnglish: Cracked Feet
3. पादशूल
संस्कृत: पादशूल
हिंदी: पैरों में दर्दEnglish: Foot Pain
4. पादभ्रंश
संस्कृत: पादभ्रंश
हिंदी: पैर की गति या उठाने में कठिनाईEnglish: Foot Drop-like Disorder
5. पादसुप्तता
संस्कृत: पादसुप्तता
हिंदी: पैरों में सुन्नपनEnglish: Foot Numbness
6. वातखुड्डता
संस्कृत: वातखुड्डता
हिंदी: चलने में कठिनाई या पैर का वातजन्य विकारEnglish: Vata-related Gait Disorder
7. गुल्फग्रह
संस्कृत: गुल्फग्रह
हिंदी: टखने में जकड़नEnglish: Ankle Stiffness
8. पिण्डिकोद्वेष्टन
संस्कृत: पिण्डिकोद्वेष्टन
हिंदी: पिंडली में ऐंठनEnglish: Calf Muscle Cramps
9. गृध्रसी
संस्कृत: गृध्रसी
हिंदी: कमर से पैर तक जाने वाला दर्दEnglish: Sciatica-like Pain
10. जानुभेद
संस्कृत: जानुभेद
हिंदी: घुटने में दर्द या विकारEnglish: Knee Pain or Disorder
11. जानुविश्लेष
संस्कृत: जानुविश्लेष
हिंदी: घुटने की अस्थिरता या असामान्य गतिEnglish: Knee Instability
12. ऊरुस्तम्भ
संस्कृत: ऊरुस्तम्भ
हिंदी: जांघ में जकड़नEnglish: Thigh Stiffness
13. ऊरुसाद
संस्कृत: ऊरुसाद
हिंदी: जांघ में भारीपन या कमजोरीEnglish: Thigh Weakness
14. पाङ्गुल्य
संस्कृत: पाङ्गुल्य
हिंदी: पैरों की गंभीर दुर्बलता या चलने में असमर्थताEnglish: Severe Lower-Limb Weakness
15. गुदभ्रंश
संस्कृत: गुदभ्रंश
हिंदी: मलद्वार का बाहर आनाEnglish: Rectal Prolapse-like Condition
16. गुदार्ति
संस्कृत: गुदार्ति
हिंदी: गुदा में दर्दEnglish: Anal or Rectal Pain
17. वृषणाक्षेप
संस्कृत: वृषणाक्षेप
हिंदी: वृषण में खिंचाव या दर्दEnglish: Testicular Pain or Spasm
18. शेफस्तम्भ
संस्कृत: शेफस्तम्भ
हिंदी: लिंग में जकड़नEnglish: Penile Stiffness
19. वङ्क्षणानाह
संस्कृत: वङ्क्षणानाह
हिंदी: जांघ के मूल या ग्रोइन क्षेत्र में खिंचावEnglish: Groin Tightness
20. श्रोणिभेद
संस्कृत: श्रोणिभेद
हिंदी: श्रोणि क्षेत्र में दर्दEnglish: Pelvic Pain
21–40 — पाचन, छाती एवं गर्दन संबंधी विकार
21. विड्भेद
संस्कृत: विड्भेद
हिंदी: मल त्याग में विकारEnglish: Altered Bowel Movement
22. उदावर्त
संस्कृत: उदावर्त
हिंदी: वात की विपरीत दिशा में गति से उत्पन्न विकारEnglish: Reversed or Disturbed Intestinal Movement
23. खञ्जत्व
संस्कृत: खञ्जत्व
हिंदी: लंगड़ाकर चलनाEnglish: Lameness
24. कुब्जत्व
संस्कृत: कुब्जत्व
हिंदी: शरीर या पीठ का झुकनाEnglish: Hunched or Kyphotic Posture
25. वामनत्व
संस्कृत: वामनत्व
हिंदी: कद का असामान्य रूप से कम होनाEnglish: Short Stature
26. त्रिकग्रह
संस्कृत: त्रिकग्रह
हिंदी: कमर के निचले हिस्से में जकड़नEnglish: Lower Back or Sacral Stiffness
27. पृष्ठग्रह
संस्कृत: पृष्ठग्रह
हिंदी: पीठ में जकड़नEnglish: Back Stiffness
28. पार्श्वावमर्द
संस्कृत: पार्श्वावमर्द
हिंदी: शरीर के पार्श्व भाग में दर्दEnglish: Flank or Side Pain
29. उदरावेष्ट
संस्कृत: उदरावेष्ट
हिंदी: पेट में मरोड़English: Abdominal Cramping
30. हृन्मोह
संस्कृत: हृन्मोह
हिंदी: हृदय क्षेत्र में बेचैनी या विकारEnglish: Cardiac-area Discomfort
31. हृद्द्रव
संस्कृत: हृद्द्रव
हिंदी: हृदय की धड़कन से संबंधित असामान्य अनुभूतिEnglish: Palpitation-like Sensation
32. वक्षउद्घर्ष
संस्कृत: वक्षउद्घर्ष
हिंदी: छाती में घर्षण या रगड़ जैसा दर्दEnglish: Chest Friction-like Discomfort
33. वक्षउपरोध
संस्कृत: वक्षउपरोध
हिंदी: छाती में रुकावट या जकड़नEnglish: Chest Restriction
34. वक्षस्तोद
संस्कृत: वक्षस्तोद
हिंदी: छाती में चुभने वाला दर्दEnglish: Stabbing Chest Pain
35. बाहुशोष
संस्कृत: बाहुशोष
हिंदी: बांह की मांसपेशियों में क्षीणताEnglish: Arm Muscle Wasting
36. ग्रीवास्तम्भ
संस्कृत: ग्रीवास्तम्भ
हिंदी: गर्दन में जकड़नEnglish: Neck Stiffness
37. मन्यास्तम्भ
संस्कृत: मन्यास्तम्भ
हिंदी: गर्दन में खिंचाव या जकड़नEnglish: Torticollis-like Neck Stiffness
38. कण्ठोद्ध्वंस
संस्कृत: कण्ठोद्ध्वंस
हिंदी: आवाज में विकारEnglish: Voice or Hoarseness Disorder
39. हनुभेद
संस्कृत: हनुभेद
हिंदी: जबड़े में दर्दEnglish: Jaw Pain
40. ओष्ठभेद
संस्कृत: ओष्ठभेद
हिंदी: होंठों का फटना या दर्दEnglish: Cracked or Painful Lips
41–60 — मुख, कान, आंख एवं सिर संबंधी विकार
41. अक्षिभेद
संस्कृत: अक्षिभेद
हिंदी: आंखों में दर्दEnglish: Eye Pain
42. दन्तभेद
संस्कृत: दन्तभेद
हिंदी: दांतों में दर्दEnglish: Toothache
43. दन्तशैथिल्य
संस्कृत: दन्तशैथिल्य
हिंदी: दांतों का ढीला होनाEnglish: Loose Teeth
44. मूकत्व
संस्कृत: मूकत्व
हिंदी: बोलने में असमर्थताEnglish: Muteness or Loss of Speech
45. वाक्संग
संस्कृत: वाक्संग
हिंदी: बोलने में रुकावटEnglish: Speech Impairment
46. कषायास्यता
संस्कृत: कषायास्यता
हिंदी: मुंह में कसैला स्वादEnglish: Astringent Taste
47. मुखशोष
संस्कृत: मुखशोष
हिंदी: मुंह का सूखनाEnglish: Dry Mouth
48. अरसज्ञता
संस्कृत: अरसज्ञता
हिंदी: स्वाद की पहचान में कमीEnglish: Reduced Taste Sensation
49. घ्राणनाश
संस्कृत: घ्राणनाश
हिंदी: सूंघने की क्षमता में कमी या समाप्तिEnglish: Loss of Smell
50. कर्णशूल
संस्कृत: कर्णशूल
हिंदी: कान में दर्दEnglish: Earache
51. अशब्दश्रवण
संस्कृत: अशब्दश्रवण
हिंदी: सुनने की क्षमता में विकारEnglish: Abnormal Hearing
52. उच्चैःश्रुति
संस्कृत: उच्चैःश्रुति
हिंदी: सुनने में कठिनाईEnglish: Hearing Impairment
53. बाधिर्य
संस्कृत: बाधिर्य
हिंदी: बहरापनEnglish: Deafness
54. वर्त्मस्तम्भ
संस्कृत: वर्त्मस्तम्भ
हिंदी: पलकों की गति में जकड़नEnglish: Eyelid Stiffness
55. वर्त्मसङ्कोच
संस्कृत: वर्त्मसङ्कोच
हिंदी: पलकों का सिकुड़नाEnglish: Eyelid Contraction
56. तिमिर
संस्कृत: तिमिर
हिंदी: दृष्टि का धुंधला होनाEnglish: Blurred Vision
57. अक्षिशूल
संस्कृत: अक्षिशूल
हिंदी: आंख में दर्दEnglish: Eye Pain
58. अक्षिव्युदास
संस्कृत: अक्षिव्युदास
हिंदी: आंख या दृष्टि का गंभीर विकारEnglish: Severe Ocular Disorder
59. भ्रूव्युदास
संस्कृत: भ्रूव्युदास
हिंदी: भौंह के स्थान या गति में विकारEnglish: Eyebrow Displacement
60. शङ्खभेद
संस्कृत: शङ्खभेद
हिंदी: कनपटी में दर्दEnglish: Temporal Pain
61–80 — तंत्रिका, संवेदना एवं सामान्य विकार
61. ललाटभेद
संस्कृत: ललाटभेद
हिंदी: माथे में दर्दEnglish: Frontal Headache
62. शिरोरुक्
संस्कृत: शिरोरुक्
हिंदी: सिरदर्दEnglish: Headache
63. केशभूमिस्फुटन
संस्कृत: केशभूमिस्फुटन
हिंदी: सिर की त्वचा में फटना या रूखापनEnglish: Scalp Fissuring or Scaling
64. अर्दित
संस्कृत: अर्दित
हिंदी: चेहरे के एक भाग का विकृत या झुक जानाEnglish: Facial Paralysis-like Disorder
65. एकाङ्गरोग
संस्कृत: एकाङ्गरोग
हिंदी: एक अंग में पक्षाघात या गंभीर कमजोरीEnglish: Monoplegia-like Disorder
66. सर्वाङ्गरोग
संस्कृत: सर्वाङ्गरोग
हिंदी: पूरे शरीर में गंभीर कमजोरी या पक्षाघातEnglish: Generalized Paralysis-like Disorder
67. पक्षवध
संस्कृत: पक्षवध
हिंदी: शरीर के एक पक्ष में पक्षाघातEnglish: Hemiplegia-like Disorder
68. आक्षेपक
संस्कृत: आक्षेपक
हिंदी: ऐंठन या शरीर में झटकेEnglish: Convulsive Spasms
69. दण्डक
संस्कृत: दण्डक
हिंदी: शरीर में कठोर ऐंठन या अकड़नEnglish: Tonic Spasm
70. तम
संस्कृत: तम
हिंदी: अंधकार जैसा अनुभव या मूर्छाEnglish: Fainting or Darkening Sensation
71. भ्रम
संस्कृत: भ्रम
हिंदी: चक्कर आनाEnglish: Dizziness or Giddiness
72. वेपथु
संस्कृत: वेपथु
हिंदी: शरीर में कंपकंपीEnglish: Tremor
73. जृम्भा
संस्कृत: जृम्भा
हिंदी: बार-बार जम्हाई आनाEnglish: Excessive Yawning
74. हिक्का
संस्कृत: हिक्का
हिंदी: हिचकीEnglish: Hiccups
75. विषाद
संस्कृत: विषाद
हिंदी: कमजोरी या उत्साह में कमीEnglish: Weakness or Lassitude
76. अतिप्रलाप
संस्कृत: अतिप्रलाप
हिंदी: अत्यधिक या असामान्य बोलनाEnglish: Excessive or Abnormal Speech
77. रौक्ष्य
संस्कृत: रौक्ष्य
हिंदी: शरीर में अत्यधिक रूखापनEnglish: Excessive Dryness
78. पारुष्य
संस्कृत: पारुष्य
हिंदी: शरीर में कठोरता या खुरदरापनEnglish: Roughness or Harshness
79. श्यावारुणावभासता
संस्कृत: श्यावारुणावभासता
हिंदी: त्वचा या शरीर का सांवला, नीला या लाल-भूरा दिखाई देनाEnglish: Dusky or Reddish-Brown Discoloration
80. अस्वप्न
संस्कृत: अस्वप्न
हिंदी: नींद न आनाEnglish: Insomnia
पाठ-भेद की महत्वपूर्ण बात: कुछ उपलब्ध डिजिटल पाठों में भ्रूव्युदास आदि को अलग गिनने के कारण 81 पद दिखाई देते हैं, जबकि मूल श्लोक 80 वात-विकार कहता है। इसलिए 80 की पारंपरिक संख्या को समझते समय पाठ-भेद ध्यान में रखना चाहिए। Charak Samhita Online भी 80 की सूची का उल्लेख करता है, जबकि अन्य प्रकाशित पाठ में 81 entries की समस्या नोट की गई है।
महत्वपूर्ण: संस्कृत शब्दों के आधुनिक English equivalents हमेशा exact medical diagnoses नहीं होते। इस सूची का उद्देश्य आयुर्वेदिक अवधारणाओं को समझना है, न कि स्वयं-निदान करना।
4. पित्त के 40 प्रमुख रोग
पित्त दोष के असंतुलन से उत्पन्न विकारों को आयुर्वेद में पित्तज नानात्मज विकार कहा जाता है। चरक संहिता में पित्त से संबंधित रोगों की संख्या असंख्य मानी गई है, लेकिन उनमें से 40 प्रमुख विकारों का वर्णन किया गया है। नीचे दी गई सूची वेबसाइट पर उपयोग के लिए संस्कृत नाम, सरल हिंदी अर्थ और निकटतम English description के साथ व्यवस्थित की गई है।
महत्वपूर्ण: English नाम आधुनिक चिकित्सा में इनके बिल्कुल समान diagnosis नहीं हैं। ये मुख्यतः आयुर्वेदिक शब्दों के निकटतम अर्थ/वर्णन हैं।
01–10 — गर्मी, जलन एवं पाचन संबंधी विकार
01. ओष (Oṣa)
हिंदी: शरीर में अत्यधिक गर्मी उत्पन्न होनाEnglish: Excessive heating sensation
02. प्लोष (Ploṣa)
हिंदी: तीव्र झुलसन या बहुत अधिक गर्मी की अनुभूतिEnglish: Scorching sensation
03. दाह (Dāha)
हिंदी: जलन या शरीर में burning sensationEnglish: Burning sensation
04. दवथु (Davathu)
हिंदी: तीव्र गर्मी या शरीर में तपनEnglish: Intense heat / burning
05. धूमक (Dhūmaka)
हिंदी: शरीर के भीतर धुएँ या धूम जैसी अनुभूतिEnglish: Fuming or smoky sensation
06. अम्लक (Amlaka)
हिंदी: अम्लता या खट्टी डकार जैसी अनुभूतिEnglish: Acidic eructation / hyperacidity
07. विदाह (Vidāha)
हिंदी: तीव्र जलन या पाचन मार्ग में burning sensationEnglish: Burning irritation / pyrosis
08. अन्तर्दाह (Antardāha)
हिंदी: शरीर के अंदर जलन या अत्यधिक गर्मीEnglish: Internal burning sensation
09. अंसदाह (Aṃsadāha)
हिंदी: कंधे के क्षेत्र में जलन या गर्मीEnglish: Burning sensation in the shoulder region
10. ऊष्माधिक्य (Ūṣmādhikya)
हिंदी: शरीर में अत्यधिक ताप या गर्मीEnglish: Excessive body heat / hyperthermia
11–20 — पसीना, शरीर की गंध एवं त्वचा संबंधी विकार
11. अतिस्वेद (Atisveda)
हिंदी: अत्यधिक पसीना आनाEnglish: Excessive sweating / hyperhidrosis
12. अंगगन्ध (Aṅgagandha)
हिंदी: शरीर से असामान्य या दुर्गंध आनाEnglish: Abnormal or foul body odour
13. अंगावदरण (Aṅgāvadaraṇa)
हिंदी: शरीर के अंगों में फटने या चीरने जैसी पीड़ाEnglish: Tearing or splitting sensation in the body
14. शोणितक्लेद (Śoṇitakleda)
हिंदी: रक्त में अत्यधिक द्रवता या क्लेद की स्थितिEnglish: Excessive moistness/fluidity associated with blood
15. मांसक्लेद (Māṃsakleda)
हिंदी: मांसपेशियों या मांसधातु में अत्यधिक क्लेदEnglish: Excessive moisture/fluidity in muscle tissue
16. त्वग्दाह (Tvagdāha)
हिंदी: त्वचा में जलन या burning sensationEnglish: Burning sensation of the skin
17. त्वगवदरण (Tvagavadaraṇa)
हिंदी: त्वचा में फटने या चीरने जैसी अनुभूतिEnglish: Cracking or splitting of the skin
18. चर्मदलन (Carmadalana)
हिंदी: त्वचा में टूटने, क्षरण या irritation की स्थितिEnglish: Skin irritation / breakdown
19. रक्तकोठ (Raktakoṭha)
हिंदी: त्वचा पर लाल उभरे हुए चकत्तेEnglish: Red wheals / urticarial patches
20. रक्तविस्फोट (Raktavisphoṭa)
हिंदी: त्वचा पर लाल फफोले या विस्फोट जैसे घावEnglish: Red vesicular eruptions
21–30 — रक्त, रंग परिवर्तन, पीलापन एवं मुख संबंधी विकार
21. रक्तपित्त (Raktapitta)
हिंदी: रक्तस्राव से संबंधित विकारEnglish: Bleeding disorder / hemorrhagic condition
22. रक्तमण्डल (Raktamaṇḍala)
हिंदी: त्वचा पर लाल गोलाकार चकत्ते या मंडलEnglish: Red circular patches
23. हरितत्व (Haritatva)
हिंदी: शरीर के किसी भाग में हरा रंग दिखाई देनाEnglish: Greenish discoloration
24. हारिद्रत्व (Hāridratva)
हिंदी: शरीर में पीले रंग का आभास या पीलापनEnglish: Yellowish discoloration
25. नीलिका (Nīlikā)
हिंदी: त्वचा पर नीले या गहरे रंग के चिह्नEnglish: Bluish or dark skin marks
26. कक्षा (Kakṣā)
हिंदी: त्वचा पर पित्त से संबंधित दाहयुक्त चकत्ते/विकारEnglish: Inflammatory skin eruption / herpes-like lesion
27. कामला (Kāmalā)
हिंदी: पीलिया जैसा पित्तप्रधान विकारEnglish: Jaundice-like condition
28. तिक्तास्यता (Tiktāsyatā)
हिंदी: मुंह में कड़वा स्वाद आनाEnglish: Bitter taste in the mouth
29. लोहितगन्धास्यता (Lohitagandhāsyatā)
हिंदी: मुंह से रक्त जैसी गंध महसूस होनाEnglish: Blood-like odour from the mouth
30. पूतिमुखता (Pūtimukhatā)
हिंदी: मुंह से दुर्गंध आनाEnglish: Foul-smelling breath / halitosis
31–40 — प्यास, मुख, गला, आंख एवं अन्य विकार
31. तृष्णाधिक्य (Tṛṣṇādhikya)
हिंदी: अत्यधिक प्यास लगनाEnglish: Excessive thirst / polydipsia
32. अतृप्ति (Atṛpti)
हिंदी: तृप्ति का अभाव या संतुष्टि न होनाEnglish: Lack of satisfaction / non-contentment
33. आस्यविपाक (Āsyavipāka)
हिंदी: मुंह में जलन, सूजन या विकृति जैसी स्थितिEnglish: Stomatitis / oral inflammation
34. गलपाक (Galapāka)
हिंदी: गले में सूजन या जलनEnglish: Throat inflammation / pharyngitis
35. अक्षिपाक (Akṣipāka)
हिंदी: आंखों में सूजन, जलन या inflammationEnglish: Eye inflammation / ophthalmic inflammation
36. गुदपाक (Gudapāka)
हिंदी: गुदा क्षेत्र में जलन या सूजनEnglish: Anal inflammation / proctitis
37. मेढ्रपाक (Meḍhrapāka)
हिंदी: जननेंद्रिय/लिंग क्षेत्र में सूजन या जलनEnglish: Inflammation of the penile/genital region
38. जीवादान (Jīvādāna)
हिंदी: रक्तस्राव या शरीर से रक्त निकलने की स्थितिEnglish: Hemorrhage / bleeding
39. तमःप्रवेश (Tamaḥpraveśa)
हिंदी: आंखों के सामने अंधेरा या darkness महसूस होनाEnglish: Darkness before the eyes / visual blackout
40. हरितहारिद्रनेत्रमूत्रवर्चस्त्व (Haritahāridranetramūtravarcastva)
हिंदी: आंखों, मूत्र और मल का हरा या पीला रंग होनाEnglish: Greenish-yellow discoloration of eyes, urine and stool
आयुर्वेदिक संदर्भ श्लोक
चरक संहिता, सूत्रस्थान 20/14 में पित्त के 40 प्रमुख विकारों का वर्णन मिलता है:
“पित्तविकारांश्चत्वारिंशतमत ऊर्ध्वमनुव्याख्यास्यामः…”
इस श्लोक के अंतर्गत ओष, प्लोष, दाह, दवथु, धूमक, अम्लक, विदाह, अन्तर्दाह आदि से लेकर हरितहारिद्रनेत्रमूत्रवर्चस्त्व तक 40 पित्तज विकार बताए गए हैं।
नोट: आयुर्वेद में पित्तज नानात्मज विकारों की यह सूची चरक संहिता में वर्णित 40 प्रमुख विकारों पर आधारित है। इनके English descriptions केवल समझने में सहायता के लिए हैं और इन्हें आधुनिक चिकित्सा के समान या निश्चित diagnosis नहीं माना जाना चाहिए। पित्त के लक्षणों को समझते समय व्यक्ति की प्रकृति, दोष-अवस्था, अग्नि, देश, काल और अन्य नैदानिक लक्षणों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।
ये 40 नाम चरक संहिता सूत्रस्थान 20/14 में दिए गए हैं।
5. कफ के 20 प्रमुख रोग
01–05 — तन्द्रा, नींद एवं शरीर में भारीपन
01. तृप्ति (Tṛpti)
हिंदी: भोजन या अन्य विषयों से असामान्य रूप से जल्दी तृप्ति या अरुचि की अनुभूतिEnglish: Abnormal satiety / loss of appetite
02. तन्द्रा (Tandrā)
हिंदी: अत्यधिक उनींदापन या सुस्तीEnglish: Drowsiness / somnolence
03. निद्राधिक्य (Nidrādhikya)
हिंदी: सामान्य से अधिक नींद आनाEnglish: Excessive sleep / hypersomnia
04. स्तैमित्य (Staimitya)
हिंदी: शरीर में जड़ता, अकड़न या गतिशीलता में कमीEnglish: Stiffness / immobility
05. गुरुगात्रता (Gurugātratā)
हिंदी: शरीर या अंगों में भारीपन महसूस होनाEnglish: Heaviness of the body
06–10 — आलस्य, मुख संबंधी एवं कफ-स्राव विकार
06. आलस्य (Ālasya)
हिंदी: काम करने की इच्छा में कमी और शारीरिक सुस्तीEnglish: Lassitude / lethargy
07. मुखमाधुर्य (Mukhamādhurya)
हिंदी: मुंह में मीठा स्वाद महसूस होनाEnglish: Sweet taste in the mouth
08. मुखस्राव (Mukhasrāva)
हिंदी: मुंह में अत्यधिक लार या स्राव आनाEnglish: Excessive salivation
09. श्लेष्मोद्गिरण (Śleṣmodgiraṇa)
हिंदी: मुंह या श्वसन मार्ग से कफ/बलगम निकलनाEnglish: Mucus expectoration
10. मलस्याधिक्य (Malasyādhikya)
हिंदी: मल या शरीर के अपशिष्ट पदार्थों की अधिकताEnglish: Excessive accumulation/excretion of waste products
11–15 — शक्ति, पाचन एवं आंतरिक आवरण संबंधी विकार
11. बलासक (Balāsaka)
हिंदी: शारीरिक शक्ति में कमी या दुर्बलताEnglish: Loss of strength / weakness
12. अपक्ति (Apakti)
हिंदी: भोजन का ठीक प्रकार से पाचन न होनाEnglish: Indigestion / impaired digestion
13. हृदयोपलेप (Hṛdayopalepa)
हिंदी: हृदय क्षेत्र में कफजन्य लेप या भारीपन की अनुभूतिEnglish: Kapha-like coating or congestion around the heart region
14. कण्ठोपलेप (Kaṇṭhopalepa)
हिंदी: गले में कफ का लेप, चिपचिपापन या जमाव महसूस होनाEnglish: Mucous coating/congestion of the throat
15. धमनीप्रतिचय (Dhamanīpraticaya)
हिंदी: धमनियों में जमाव या संचय की स्थितिEnglish: Accumulation/thickening in blood vessels
16–20 — गर्दन, वजन, अग्नि एवं त्वचा संबंधी विकार
16. गलगण्ड (Galagaṇḍa)
हिंदी: गर्दन के क्षेत्र में असामान्य सूजन या गांठEnglish: Neck swelling / goitre-like enlargement
17. अतिस्थौल्य (Atisthaulya)
हिंदी: शरीर में अत्यधिक स्थूलता या मोटापाEnglish: Excessive corpulence / obesity
18. शीताग्निता (Śītāgnitā)
हिंदी: पाचन शक्ति का मंद या कमजोर होनाEnglish: Reduced digestive power / low digestive fire
19. उदर्द (Udarda)
हिंदी: त्वचा पर उभरने वाले खुजलीयुक्त चकत्ते या पित्ती जैसे विकारEnglish: Urticarial-type skin eruption
20. श्वेतावभासता (Śvetāvabhāsatā)
हिंदी: शरीर या त्वचा का असामान्य रूप से फीका या सफेद दिखाई देनाEnglish: Pallor / whitish appearance
अतिरिक्त वर्णित विशेषता
चरक संहिता के मूल पाठ में अंतिम क्रम में “श्वेतमूत्रनेत्रवर्चस्त्व” का भी उल्लेख आता है, अर्थात मूत्र, नेत्र एवं मल के रंग में श्वेतता/फीकापन। यही कारण है कि कुछ अनुवादों में सूची को 20वें बिंदु के अंतर्गत संयुक्त रूप से प्रस्तुत किया जाता है। मूल संस्कृत पाठ में इसे श्वेतावभासता के साथ लगातार वर्णित किया गया है।
मूल श्लोक — चरक संहिता
“श्लेष्मविकारांश्च विंशतिमत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यामः; तद्यथा— तृप्तिश्च, तन्द्रा च, निद्राधिक्यं च, स्तैमित्यं च, गुरुगात्रता च, आलस्यं च, मुखमाधुर्यं च, मुखस्रावश्च, श्लेष्मोद्गिरणं च, मलस्याधिक्यं च, बलासकश्च, अपक्तिश्च, हृदयोपलेपश्च, कण्ठोपलेपश्च, धमनीप्रतिचयश्च, गलगण्डश्च, अतिस्थौल्यं च, शीताग्निता च, उदर्दश्च, श्वेतावभासता च, श्वेतमूत्रनेत्रवर्चस्त्वं च।”
सरल अर्थ: चरकाचार्य ने कफ से उत्पन्न होने वाले असंख्य विकारों में से 20 प्रमुख विकारों का उल्लेख किया है, जिनमें अत्यधिक तृप्ति, तन्द्रा, अधिक नींद, शरीर में जड़ता व भारीपन, आलस्य, मुंह में मिठास, अधिक लार, कफ का स्राव, अपशिष्ट पदार्थों की अधिकता, कमजोरी, अपच, हृदय एवं कंठ में कफजन्य लेप, धमनी में संचय, गलगण्ड, अतिस्थूलता, मंदाग्नि, उदर्द तथा श्वेत/फीके रंग से संबंधित लक्षण शामिल हैं।
नोट: ये 20 नाम चरक संहिता में वर्णित कफज नानात्मज विकारों की सूची हैं। चरक के श्लोक में अंतिम “श्वेतमूत्रनेत्रवर्चस्त्व” को श्वेतावभासता के वर्णनात्मक रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है; इसलिए विभिन्न अनुवादों में इसे 20वीं सूची के साथ अलग या संयुक्त रूप में दिखाया जा सकता है। मूल वर्गीकरण संख्या 20 कफ-विकार ही देता है।
6. रोगों की पहचान: आयुर्वेद का निदान-पंचक
आयुर्वेद में निदान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत निदान पंचक है। चरक संहिता, निदानस्थान 1/6 में कहा गया है:
“तस्योपलब्धिर्निदानपूर्वरूपलिङ्गोपशयसम्प्राप्तितः॥”
अर्थात रोग को समझने के लिए पांच बातों का अध्ययन किया जाता है:
निदान — रोग का कारण
पूर्वरूप — रोग प्रकट होने से पहले के संकेत
रूप/लिङ्ग — वर्तमान लक्षण और चिन्ह
उपशय — किससे आराम मिलता है
सम्प्राप्ति — रोग बनने की प्रक्रिया/pathogenesis
इसके अतिरिक्त आयुर्वेद में रोगी की प्रकृति, विकृति, अग्नि, धातु, मल, बल, आयु, देश, काल और आहार-विहार का भी मूल्यांकन किया जाता है।
इसलिए केवल ऑनलाइन लक्षण देखकर “मुझे वात रोग है” या “यह पित्त रोग है” तय करना उचित नहीं है।
7. आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से 140 रोगों को कैसे समझें?
यहां सबसे महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
चरक की 140-विकार सूची आधुनिक ICD या आधुनिक चिकित्सा की disease classification नहीं है। उदाहरण के लिए गृध्रसी को आधुनिक संदर्भ में “sciatica-like” कहा जा सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर गृध्रसी रोगी का निदान आधुनिक चिकित्सा में sciatica ही होगा।
इसी प्रकार:
पक्षवध → hemiplegia जैसा दिख सकता है
कामला → jaundice से संबंधित हो सकता है
गलगण्ड → goiter-like swelling हो सकती है
उदर्द → urticaria जैसा दिख सकता है
तिमिर → visual impairment से संबंधित हो सकता है
लेकिन ये व्याख्यात्मक समानताएँ हैं, प्रमाणित एक-से-एक equivalence नहीं।
आधुनिक चिकित्सा में किसी गंभीर लक्षण के लिए clinical history, physical examination और आवश्यकतानुसार blood tests, imaging, ECG, neurological examination, endoscopy या अन्य परीक्षण किए जा सकते हैं।
WHO की वर्तमान Traditional Medicine Strategy 2025–2034 भी पारंपरिक चिकित्सा के लिए evidence, safety, quality और appropriate regulation पर जोर देती है।
8. रोगों के निदान के सबसे उपयोगी तरीके और सावधानियां
आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से
पहला चरण — रोगी की जानकारी:प्रकृति, आयु, आहार, नींद, दिनचर्या, मानसिक स्थिति और पुरानी बीमारी समझना।दूसरा चरण — रोग की जानकारी:निदान पंचक, दोष, दूष्य, स्थान, स्रोतस और सम्प्राप्ति का आकलन।तीसरा चरण — चिकित्सकीय परीक्षण:नाड़ी, जिह्वा, त्वचा, मल-मूत्र, नेत्र, आवाज, शरीर की संरचना और अन्य पारंपरिक परीक्षणों के साथ आवश्यक आधुनिक जांचों को भी ध्यान में रखना।चौथा चरण — आधुनिक परीक्षण जहां जरूरी हो:छाती में दर्द, अचानक पक्षाघात, गंभीर सिरदर्द, लगातार रक्तस्राव, सांस लेने में कठिनाई, बेहोशी, तेज बुखार, पीलिया, अचानक दृष्टि/श्रवण हानि या गंभीर पेट दर्द जैसे मामलों में आधुनिक चिकित्सा मूल्यांकन में देरी नहीं करनी चाहिए।
चरक का बहुत महत्वपूर्ण निर्देश है:
“रोगमादौ परीक्षेत ततोऽनन्तरमौषधम्।”
अर्थ: पहले रोग की परीक्षा/पहचान करनी चाहिए, उसके बाद औषधि का चयन करना चाहिए।
यह सिद्धांत आज भी समस्या-समाधान के दृष्टिकोण से अत्यंत उपयोगी है: पहले कारण और रोग की प्रकृति समझें, फिर उपचार चुनें।
9. आयुर्वेदिक उपचार में सावधानियां और कुछ दुर्लभ लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य
1. 140 रोग वास्तव में “कुल रोग” नहीं हैं
यह सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है। चरक स्वयं रोगों को “अपरिसंख्येय” यानी असंख्य बताते हैं। अलग-अलग दोष, स्थान, कारण और लक्षणों के संयोजन से अनेक रोगरूप बन सकते हैं।
2. एक ही व्यक्ति में कई दोष शामिल हो सकते हैं
वात-पित्त, पित्त-कफ या वात-कफ जैसे मिश्रित विकारों की अवधारणा आयुर्वेद में मौजूद है। इसलिए हर रोग को केवल “वात” या “पित्त” कह देना सरलीकरण होगा।
3. 80-40-20 का अर्थ यह नहीं कि वात सबसे ज्यादा “बीमारी” करता है
यह केवल इस विशेष नानात्मज विकार वर्गीकरण में वर्णित संख्या है। इसे यह साबित करने के लिए नहीं इस्तेमाल करना चाहिए कि कोई दोष आधुनिक चिकित्सा की दृष्टि से अधिक खतरनाक है।
4. “प्राकृतिक” हमेशा “सुरक्षित” नहीं होता
NCCIH के अनुसार कुछ Ayurvedic preparations में lead, mercury या arsenic विषाक्त मात्रा में पाए जा सकते हैं। इसलिए अज्ञात स्रोत से खरीदी गई दवाओं, विशेषकर धातु/खनिज-युक्त तैयारियों का उपयोग बिना योग्य चिकित्सकीय मार्गदर्शन के नहीं करना चाहिए।
5. आधुनिक दवा अचानक बंद न करें
यदि कोई व्यक्ति diabetes, hypertension, epilepsy, thyroid, heart disease या अन्य chronic condition की दवा ले रहा है, तो आयुर्वेदिक उपचार शुरू करने के कारण अपनी prescribed medicine अपने-आप बंद नहीं करनी चाहिए।
6. “नाड़ी देखकर हर बीमारी निश्चित रूप से पता चल जाती है” कहना उचित नहीं
आयुर्वेदिक परीक्षण महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन गंभीर रोगों में आधुनिक diagnostic tests की आवश्यकता को केवल नाड़ी या घरेलू निरीक्षण के आधार पर नकारना सुरक्षित नहीं है।
10. FAQ — आयुर्वेद में रोगों और 140 विकारों से जुड़े प्रश्न
प्रश्न 1: आयुर्वेद में कुल कितने रोग हैं?
उत्तर: कोई निश्चित अंतिम संख्या नहीं है। चरक संहिता रोगों को विभिन्न कारणों और संयोजनों के कारण अपरिसंख्येय मानती है। 140 एक विशिष्ट वर्गीकरण है—80 वात, 40 पित्त और 20 कफ।
प्रश्न 2: क्या 140 रोगों की सूची में आधुनिक सभी बीमारियां शामिल हैं?
उत्तर: नहीं। यह आधुनिक चिकित्सा की complete disease list नहीं है। कई आधुनिक रोगों का सीधे नाम से उल्लेख इन 140 विकारों में नहीं मिलेगा।
प्रश्न 3: क्या हर सिरदर्द वात रोग है?
उत्तर: नहीं। आयुर्वेद में सिरदर्द का कारण दोष, स्थान, प्रकृति, आहार-विहार और अन्य कारकों के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
प्रश्न 4: क्या कामला और jaundice एक ही बीमारी हैं?
उत्तर: दोनों में कुछ clinical similarities हो सकती हैं, इसलिए कामला को jaundice-like condition के रूप में समझाया जाता है। लेकिन दोनों प्रणालियों की diagnostic definitions पूरी तरह समान नहीं मानी जानी चाहिए।
प्रश्न 5: रोग का निदान करने के लिए आयुर्वेद में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत क्या है?
उत्तर: निदान पंचक—निदान, पूर्वरूप, रूप/लिङ्ग, उपशय और सम्प्राप्ति—रोग को समझने की मूल रूपरेखा है।
प्रश्न 6: क्या 140 रोगों की सूची देखकर व्यक्ति अपना दोष स्वयं निर्धारित कर सकता है?
उत्तर: केवल सूची देखकर नहीं। लक्षण कई अलग-अलग कारणों से हो सकते हैं। व्यक्तिगत निदान के लिए योग्य चिकित्सक द्वारा रोगी और रोग दोनों का मूल्यांकन आवश्यक है।
प्रश्न 7: क्या Ayurveda और modern medicine को साथ इस्तेमाल किया जा सकता है?
उत्तर: कुछ परिस्थितियों में complementary/integrative approach अपनाई जा सकती है, लेकिन उपचारों के बीच संभावित drug interactions और safety को चिकित्सकीय रूप से जांचना चाहिए। WHO की वर्तमान रणनीति भी evidence-based, safe और regulated integration पर जोर देती है।
प्रश्न 8: क्या आयुर्वेदिक दवाएं हमेशा सुरक्षित होती हैं?
उत्तर: नहीं। “Natural” का अर्थ automatically risk-free नहीं है। विशेषकर कुछ धातु/खनिज-युक्त preparations में toxicity का जोखिम हो सकता है। प्रमाणित स्रोत और qualified practitioner महत्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष
आयुर्वेद में रोग को केवल एक नाम या एक लक्षण के रूप में नहीं, बल्कि कारण, दोष, स्थान, व्यक्ति और रोग की उत्पत्ति की पूरी प्रक्रिया के रूप में समझने की कोशिश की जाती है। चरक संहिता का 80 वात + 40 पित्त + 20 कफ वाला वर्गीकरण इस दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 140 रोग आयुर्वेद के सभी रोगों की अंतिम संख्या नहीं हैं। स्वयं शास्त्रीय परंपरा रोगों को अनेक कारणों और संयोजनों के कारण असंख्य मानती है।
इसलिए किसी रोग की पहचान के लिए केवल इंटरनेट सूची, घरेलू नुस्खे या एक अकेले लक्षण पर निर्भर रहने के बजाय निदान पंचक + रोगी का व्यक्तिगत मूल्यांकन + आवश्यकता पड़ने पर आधुनिक diagnostic tests का संतुलित उपयोग अधिक व्यावहारिक है।
प्रमुख शास्त्रीय संदर्भ
चरक संहिता — सूत्रस्थान 20, महारोगाध्याय, विशेषतः 20/3–10: रोगों का वर्गीकरण और 80-40-20 संख्या।
चरक संहिता — सूत्रस्थान 20/11: वात के प्रमुख विकार।
चरक संहिता — सूत्रस्थान 20/14: पित्त के 40 विकार।
चरक संहिता — सूत्रस्थान 20/17: कफ के 20 विकार।
चरक संहिता — सूत्रस्थान 20/20–22: निदान के बाद औषधि और उपचार का चयन।
चरक संहिता — निदानस्थान 1/6: निदान पंचक।
Charak Samhita Research, Training and Development Centre: निदानस्थान में रोग-निदान की व्याख्या और आधुनिक संदर्भ।
WHO Traditional Medicine Strategy 2025–2034: evidence, safety, quality और responsible integration.
NCCIH — Ayurvedic Medicine: In Depth: Ayurveda की उपलब्ध clinical evidence और safety considerations.
स्रोत-आधारित लेखन के लिए मुख्य संदर्भ: Charak Samhita Online — Nidana Sthana · Charak Samhita Online — Vata Dosha · WHO — Traditional, Complementary and Integrative Medicine · NCCIH — Ayurvedic Medicine: In Depth
Author bio
Mukesh Kumar
योग्यता: D. Pharm. (Ayurvedic Pharmacy)
भूमिका: Ayurveda & Natural Wellness Content Researcher
समीक्षा/अपडेट: 16 September 2026
स्रोत: आयुर्वेदिक ग्रंथ, सरकारी स्वास्थ्य स्रोत एवं उपलब्ध विश्वसनीय वैज्ञानिक शोध

